Tuesday, November 27, 2012

मैनपुरी की तारकशी कला

मैनपुरी की तारकशी कला

मैनपुरी का देवपुरा मोहल्ला…..तंग गलियों में  हथौडी की चोट की गूंजती आवाज़…..को पकड़ते हुए जब चलना शुरू कर देंगे तो एक सूने से लकड़ी के दरवाज़े के खुलते ही एक ऐसी बेमिसाल कला का दीदार होगा जिसे तारकशी कहते है.पूरी दुनिया में तारकशी कला का मैनपुरी ही एक मात्र केंद्र है.इस कला की शुरुआत कैसे हुयी ये कहना मुश्किल है.लेकिन हिंदुस्तान में जब ब्रितानी हुकमत का सिलसिला शुरू हुआ तो तारकशी सात समन्दर पार पहुंच गयी. हिंदुस्तान से सीधे इस कला को पहचान नहीं मिली. यूरोप के देशो में इस कला को जबरदस्त लोकप्रियता हासिल हुयी.18 वी सदी में तारकशी के चाहने वाले पुरी दुनिया में हो गए.लेकिन अफ़सोस मैनपुरी में तारकशी की कला दम तोडती नजर आ रही है.कद्रदान होने के बाद भी इस कला को अपनाने वालों की कमी…..इस कला के वजूद  के लिए खतरा बन गयी है.
मैनपुरी की भोगोलिक स्थिति के चलते तारकशी मैनपुरी की पहचान बनी.मैनपुरी में शीशम के पेड़ अधिक है.शीशम की लकड़ी अधिक मजबूत होती है.इसलिए इस लकड़ी का हमारे दैनिक कार्यों में सबसे अधिक प्रयोग है.चूँकि तारकशी लकड़ी पर की जाने वाली एक तरह की नक्काशी कला है जो धातु के तारो से की जाती है.इसके लिए लकड़ी को खास तरह से तैयार किया जाता है जो एक जटिल और लम्बी प्रक्रिया है.इस कला का सबसे पहले जिक्र 1864 में अस्सिटेंट कलक्टर फेडरिक सीमन ग्राउस ने किया था.ग्राउस ने अपने कई संस्मरणों में तारकशी का जिक्र किया है.ग्राउस इस कला से बेहद मुत्तासिर थे.चौहन वंश की एक शाखा जब मैनपुरी आई तो उनके साथ एक ओझा परिवार भी आया.जो काष्ठकला में माहिर था.इस परिवार की बनायीं हुयीं कई चीजें लखनऊ मूजियम में रखीं है.
 
एक समय था जब मैनपुरी के हर घर में तारकसी की झलक मिलती थी.प्रसिद्ध इतिहासकार परसी ब्राउन ने भी इस कला का ज़िक्र किया है.आज़ादी के बाद तारकशी से बनायीं गयी शीशम की लकड़ी से निर्मित काष्ठ हाथी की प्रतिमा शिल्पकार रामस्वरूप ने राष्ट्रपति को भेंट की.मैनपुरी में रामस्वरूप ने इस कला को जीवित रखने में विशेष योगदान दिया.मोहल्ला देवपुरा में बना उनका कच्चा – पक्का मकान उनकी कला की झलक आज भी पेश करता है.  शीशम की प्लेट पर बनी तारकशी की आकृति कला कृतियाँ उपहार में देने का चलन है.रथों का प्रयोग इतिहास से मिलता है.तेजगति से चलने वाले रथ और मंझोली के पहिया तारकशी कला का शानदार उदाहरण है.

आधुनिकता और पेड़ों की अँधा धुंध कटाई से तारकशी कला का नुकसान हुआ है.भवन निर्माण में लोहे का अधिक् प्रयोग के चलते अब घरों में इस कला को जगह नहीं मिल पा रही है.सरकार को चाहिए की इस शानदार कला को जीवित रखने के लिए असरदार कदम उठाए.

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन November 28, 2012 at 6:46 PM  

नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाने सरबत दा भला - ब्लॉग बुलेटिन "आज गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा है , आप सब को पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से गुरुपर्व की और कार्तिक पूर्णिमा की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ !”आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

monali December 13, 2012 at 9:51 AM  

I wonder how come i never saw dis blog.. Mainpuri mera nanihaal tha.. wahaan DEVOROAD pe meri maa ka ghar tha aur bagal me Kachcha aadhti school... badi achhi yaadein is shehar ki :)

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